चार अरकान · 01
पहला क़दम: एहराम
नीयत और तल्बिया के साथ एहराम में दाख़िल होना, क्या पहनें, और मस्जिद अल-हराम पहुँचने की दुआएँ।
एहराम वह पाक हालत है जिसमें ज़ायर मीक़ात पार करने से पहले दाख़िल होता है। आपको ज़ायर नीयत बनाती है। सफ़ेद चादरें उस हालत का हिस्सा हैं, ख़ुद हालत नहीं।
एहराम से पहले
- नाख़ून काटें, ग़ैर ज़रूरी बाल साफ़ करें, और मुमकिन हो तो ग़ुस्ल करें। वुज़ू भी काफ़ी है।
- मर्द नीयत से पहले जिस्म पर (चादरों पर नहीं) ख़ुशबू लगा सकते हैं।
- मकरूह वक़्त न हो तो दो रकअत पढ़ें, या किसी फ़र्ज़ नमाज़ के बाद नीयत करें।
लिबास
मर्द
- दो सफ़ेद बिना सिली चादरें: कमर पर इज़ार और कंधों पर रिदा
- ऐसी चप्पल जिससे टख़ने और पैर का ऊपरी हिस्सा खुला रहे
- सिर पर कुछ नहीं
- जिस्म के नाप का सिला लिबास नहीं, जैसे क़मीज़, पतलून या अंडरवियर
औरतें
- आम, ढीला, पर्दे वाला लिबास जो जिस्म ढके। कोई ख़ास रंग नहीं।
- बाल ढकने वाला हिजाब
- चेहरा और हाथ खुले रहें: न नक़ाब न दस्ताने
- आरामदायक जूते
नीयत और तल्बिया
मीक़ात पर दिल में उमरा की नीयत करें। बहुत से ज़ायरीन ये शब्द ज़बान से भी कहते हैं।
لَبَّيْكَ عُمْرَةً
Labbayka ʿumrah.
मैं हाज़िर हूँ [ऐ अल्लाह] उमरा के लिए।
मीक़ात पर, दिल में। इन शब्दों को ज़बान से कहना आम रिवाज है।
Sahih Muslim 1232
फिर तल्बिया शुरू करें। मर्द आवाज़ ऊँची करें; औरतें इतनी आवाज़ में पढ़ें कि पास वाली सुन ले। मीक़ात से तवाफ़ शुरू होने तक बार-बार दोहराएँ।
لَبَّيْكَ اللّٰهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لَا شَرِيكَ لَكَ
Labbayk Allāhumma labbayk, labbayka lā sharīka laka labbayk. Innal-ḥamda wan-ni'mata laka wal-mulk, lā sharīka lak.
मैं हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, मैं हाज़िर हूँ। मैं हाज़िर हूँ, तेरा कोई शरीक नहीं, मैं हाज़िर हूँ। बेशक सारी तारीफ़, नेमत और बादशाहत तेरी ही है। तेरा कोई शरीक नहीं।
उमरा की नीयत के बाद, और तवाफ़ शुरू होने तक बार-बार। मर्द ऊँची आवाज़ में, औरतें धीमी आवाज़ में।
Sahih al-Bukhari 1549; Sahih Muslim 1184
“ऐ अल्लाह, इस एहराम को मेरे लिए आसान कर दे और मुझे हर उस चीज़ से बचा जो इसे तोड़ दे।”
निजी दुआ; किसी भी भाषा में करें।
मस्जिद अल-हराम पहुँचना
दायाँ पैर पहले रखकर दाख़िल हों और मस्जिद में दाख़िले की दुआ पढ़ें। बहुत से ज़ायरीन काबा की पूर्वी तरफ़ वाले दरवाज़ों, जैसे बाबुस्सलाम, से दाख़िल होते हैं, लेकिन कोई भी दरवाज़ा ठीक है।
بِسْمِ اللّٰهِ، وَالصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ عَلَى رَسُولِ اللّٰهِ، اللّٰهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ
Bismillāh, waṣ-ṣalātu was-salāmu 'alā Rasūlillāh. Allāhummaftaḥ lī abwāba raḥmatik.
अल्लाह के नाम से, और अल्लाह के रसूल पर दुरूद और सलाम। ऐ अल्लाह, मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे।
दायाँ पैर पहले रखें, मस्जिद अल-हराम हो या कोई भी मस्जिद।
Sahih Muslim 713; Sunan Ibn Majah 771
जब पहली बार काबा पर नज़र पड़े तो हाथ उठाएँ और अल्लाह से जो चाहें माँगें। यह वह लम्हा है जो बहुत से ज़ायरीन को उम्र भर याद रहता है।
اللّٰهُمَّ زِدْ هٰذَا الْبَيْتَ تَشْرِيفًا وَتَعْظِيمًا وَتَكْرِيمًا وَمَهَابَةً، وَزِدْ مَنْ شَرَّفَهُ وَكَرَّمَهُ مِمَّنْ حَجَّهُ أَوِ اعْتَمَرَهُ تَشْرِيفًا وَتَكْرِيمًا وَتَعْظِيمًا وَبِرًّا
Allāhumma zid hādhal-bayta tashrīfan wa ta'ẓīman wa takrīman wa mahābah, wa zid man sharrafahu wa karramahu mimman ḥajjahu awi'tamarahu tashrīfan wa takrīman wa ta'ẓīman wa birrā.
ऐ अल्लाह, इस घर की इज़्ज़त, अज़मत, तकरीम और हैबत बढ़ा दे, और हज या उमरा करने वालों में से जो इसकी ताज़ीम और तकरीम करे, उसकी इज़्ज़त, तकरीम, अज़मत और नेकी बढ़ा दे।
हाथ उठाकर अल्लाह से जो चाहें माँगें। ये शब्द पहले के बुज़ुर्गों से मनक़ूल हैं।
Reported by al-Shafiʿi in al-Umm and al-Bayhaqi; its chain is considered weak